Friday, August 16, 2013

नन्हीं बेटी केलिए

क़लम

मेरी क़लम जी लाल हैं
करती वह कमाल हैं

जैसे-जैसे हाथ कहे
सुन्दर वह लिखती रहें

पर भूखी जब हो जातीं
चलती नहीं हैं, अड़ जातीं

स्याही पीतीं पेटू राम
तब जाकर करती हैं काम


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यह है मेरी प्यारी बिल्ली,
चूहा खाने पहुँची दिल्ली,
छिप चूहे ने जब की टिल्ली,
तब बिल्ली की उड़ गई खिल्ली।

उसने खानी चाही मछली,
कलकत्ते की सैर को निकली,
बड़ी-सी मछली मुँह में भर ली,
चिकनी थी वह फट से फिसली।

बम्बई जाकर चिड़िया धर ली,
मार के चोंचें, वह भी उड़ ली,
बोली दूध है घर में, पगली,
फिर क्यों मेरी जान को मचली?

वापस घर को आई लल्ली,
दूध पिया, तब हुई तसल्ली,
कलकत्ता, बम्बई वह भूली
और कभी ना जाती दिल्ली।

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दो पहाड़ों के पीछे से

सूरज चमक रहा है।

पेड़, घास और चिड़ियों का

जीवन दमक रहा है।

कल-कल करती नदी में देखो

झरना बरस रहा है।

बगुला, बतख़, मछलियों के संग

नाविक विचर रहा है।

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